Friday, October 15, 2010

बचपन की कुछ यादें

सर्द मौसम हो या तेज़ हवा के झोंके
या फिर छुपा हो आसमां बादलों के तले
हर शाम नीले आसमां की ख्वाहिश
खीच ही लाती है पंछियों को घोंसलों से

मौसम की सर्द तो शाम के जवां इरादों में गुम  हो जाती है कहीं 
झोंके हवा के सहने को झुंड अपने ही aerodynamic आकार बना लेते हैं
झाड़ियाँ, दीवार और माँ का आँचल तो होते नहीं आसमान में छुपने को
इसलिए बदरिया शाम को ही लुका छिपी का लुत्फ़ उठा लेते हैं
अचानक ही नजर पड़ी जब आसमां में 
आकार बदलते पंछियों के झुण्ड पर कल 
तो याद हो आये मुझे बचपन के वो कुछ पल 
जब इन्तजार रहता था हर शाम 
घडी की छोटी सुई के पांच पर पहुचने का 
और फिर दो मिनट हिम्मत जुटाते थे 
माँ से, खेलने जाऊं, ये साहसिक प्रश्न पूछने का 
हर रोज कुछ अलग shots लगाने की योजनायें 
कुछ बेहतरीन catch  गुपकने के भरसक प्रयास 
उन दो घंटों की अलग ही दुनिया थी 
जहाँ स्कूल के भारी  बस्तों का बोझ नहीं था 
बगल में बैठे दोस्त से छुप कर बात करने में 
मास्टर साहब का खौफ नहीं था 
मजे की बात ये थी कि
वैसे हर घंटे भूख प्यास और न जाने क्या क्या लगता था 
मगर इन दो घंटों में किसी और बात का होश भी नहीं था 
अगर कभी रात को बिजली विभाग की दया हो जाये 
तो हमें भी छुपा छुपी खेलने का मौका मिल जाता था 
कभी पीपल के पीछे तो कभी पडोसी के बरामदे में 
दुबक कर बैठ जाते थे 
कभी चुपके से दीदी से पूछ लेने पे 
झगडे करने में भी बड़े मजे आते थे
मगर अब तो स्कूल के बस्ते और भी भरी हैं 
टयूसन वाले मास्टर साहब भी शाम को ही खली हैं 
अब तो कार्टून और कंप्यूटर ही मन बहलाते हैं 
वीक एंड पे पापा कभी कभी पार्क भी ले जाते हैं 

 

10 comments:

  1. Ultimate description..
    .
    Bahut hi umda likhe ho tiwari...maza aa gaya padh ke..bahut din baad kuch bahut hi achcha aur meaningful padhne ko mila..ek naye kavi ki leknahi se...!!!

    ReplyDelete
  2. gud writing chacha..........ab to dhire dhire aap prof ho rahe ho......dr. cum shayar:)

    ReplyDelete
  3. nahi yaar...Dr. banna confirm nahi hai isliye alternatives abhi se dhoondh raha hoon :)

    ReplyDelete
  4. Brilliant hai bhai!

    ReplyDelete
  5. संतोष राघवनOctober 15, 2010 at 7:55 PM

    यह हुई न बात...ऐसे ही हिन्दी मे लिखते रहो !!! अंग्रेज़ी मे लिखोगे तो पढ़ने मे फीलिंग नहीं आएगी ! :)
    बहुत बढिया लिखा है :)

    ReplyDelete
  6. dhanyavad is utsahvardhan ke liye :)

    ReplyDelete
  7. sahi likha hai. ab to mummy papa ke paas bhi time nahi, maid se hi poochna padta hai.

    ReplyDelete
  8. "अब तो कार्टून और कंप्यूटर ही मन बहलाते हैं
    वीक एंड पे पापा कभी कभी पार्क भी ले जाते है"

    - सच्चाई से साक्षात्कार कराती प्रशंसनीय प्रस्तुति - बधाई तथा शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  9. bahut si yaade mere pass bhi h.

    ReplyDelete